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Wednesday, January 10, 2018

उठो, जागो और ध्येय की प्राप्ति तक रूको मत.....स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था उनका परिवार एक पारंपरिक कायस्थ परिवार थाए विवेकानंद के 9 भाई.बहन थे। उनके पिता का नाम विश्वनाथदत्त था वो कोलकाता उच्च न्यायालय में वकालत करते थे,, माता भुवनेश्वरी देवी एक सरल और मार्मिक महिला थी,,,,,,संन्यास धारण करने से पहले विवेकानंद का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था,,,लेकिन नरेन के नाम से जाने जाते थे,,विवेकानंद का परिवार उदारता व विद्वता के लिए विख्यात था,,,,,,नरेंद्र की बुद्धि बचपन से ही तीव्र थी इसलिए वो पहले ब्रहम समाज में गए,,इसी बीच वे कोलकाता विवि से बी ए की परीक्षा उतीर्ण किए,,,और कानून की परीक्षा की तैयारी करने लगे,,,,वे विभिन्न विषयो जैसे दर्शन शास्त्रए धर्मए इतिहासए सामाजिक विज्ञानंए कला और साहित्य के उत्सुक पाठक थे। हिंदु धर्मग्रंथो में भी उनकी बहोत रूचि थी जैसे वेदए उपनिषदए भगवत गीताए रामायणए महाभारत और पुराण। नरेंद्र भारतीय पारंपरिक संगीत में निपुण थेए और हमेशा शारीरिक योगए खेल और सभी गतिविधियों में सहभागी होते थे। ब्रह्म समाज के सदस्य के रूप मेंए वे मूर्ति पूजाए बहुदेववाद और रामकृष्ण की काली देवी के पूजा के विरुद्ध थे एक दिन  नरेंद्रनाथ दत्त के एक संबंधी ने उन्हें रामकृष्ण परमहंस के पास ले गए,,,नरेंद्रनाथ दत्त  को देखते ही रामकृष्ण परमहंस ने पूछा,,क्या तुम धर्म विषयक कुछ भजन गा सकते हो तो नरेन ने कहा कि हां गा सकता हूं,,और फिर दो तीन भजन सुनते ही रामकृष्ण अति प्रसन्न हुए,,,,,और वो रामकृष्ण के शिष्य बन गए,,,,1887 से 1892 के बीच विवेकानंद अज्ञातावस्था में रहे,,,,,इस दरम्यान वो भारत भ्रमण पर रहे,,,16 अगस्त 1886 वो स्वामी रामकृष्ण परमहंस स्वर्ग सिधार गए,,,स्वामी विवेकानंद विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरू थे,,,,विवेकानंद अमेरिका में 1893  में शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था,,,,भारत का वेदान्त अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानंद के कारण पहुंचा,,,,रामकृष्ण मिशन की स्थापना भी स्वामी विवेकानंद की देन है,,,,,,ये रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य व प्रतिभावान शिष्य थे,,,स्वामी विवेकानन्द के अनमोल वचन
ष्उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।ष् अर्थात् उठो, जागो और ध्येय की प्राप्ति तक रूको मत।
4 जुलाई 1902 ;उनकी मृत्यु का दिनद्ध को विवेकानंद सुबह जल्दी उठेए और बेलूर मठ के पूजा घर में पूजा करने गये और बाद में 3 घंटो तक योग भी किया। उन्होंने छात्रो को शुक्ल.यजुर.वेदए संस्कृत और योग साधना के विषय में पढायाए बाद में अपने सहशिष्यों के साथ चर्चा की और रामकृष्ण मठ में वैदिक महाविद्यालय बनाने पर विचार विमर्श किये।  7 pm  को विवेकानंद अपने रूम में गये और अपने शिष्य को शांति भंग करने के लिए मना किया और 9 pm  को योगा करते समय उनकी मृत्यु हो गयी। उनके शिष्यों के अनुसारए उनकी मृत्यु का कारण उनके दिमाग में रक्तवाहिनी में दरार आने के कारन उन्हें महासमाधि प्राप्त होना है।,,,उनके शिष्यों के अनुसार उनकी महासमाधि का कारण ब्रह्मरंधरा ;योगा का एक प्रकारद्ध था। उन्होंने अपनी भविष्यवाणी को सही साबित किया की वे 40 साल से ज्यादा नहीं जियेंगे। बेलूर की गंगा नदी में उनके शव को चन्दन की लकडियो से अग्नि दी गयी।
       स्वामी विवेकानंद का 12 जनवरी ये जन्मदिन युवादीन के रूप में मनाया जाता हैं।

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